मैं गुजरात में तारंगा नाम के स्थान में गया। वहां एक पुरूष के एक रोटी लंगूर को खाने को दी। लंगूर ने रोटी को मूंह में डाला, और जब वह रोटी आधी उसके मूंह में और आधी बाहर थी, तभी एक दूसरा लंगूर आया और उस रोटी को अपने हाथ से छीनकर भागता चला। मुझे देखके ऐसा लगा कि देखो इन लंगूरो में नैतिकता का इतना अभाव है कि दूसरे के मूंह से रोटी तक ये छीन लेते हैं।
कुछ दिनो बाद मैं अपने शहर सहारनपुर आया और वहां भी एक घटना देखी। एक वुढ़िया रोटी दूध में डालकर एक कमजोर कुत्ते के लिये लायी। और उसने दूध में डूबी रोटी नीचे फ़र्श पर कुत्ते के लिये डाली। और तभी एक दूसरा ताकतवर कुत्ता दूर से भौंकते और गुर्राते हुवे आया, और उससे डरके कमजोर कूत्ता दूर भागने लगा। ताकतवर कुत्ता आके वह रोटी खाने लगा। बुढिया ने ताकतवर कुत्ते को धमकाया, मगर उसे इसका कोई असर नहीं पढ़ा। वो पूरी रोटी खा गया, और बुढ़िया दुखी होकर चली गयी। अब मैने समझा कि नैतिकता की कमी मात्र लंगूरो में ही नहीं बाकी जानवरो में भी है।
कुछ दिनो बाद और विचार आये तो ऐसा लगा कि यह अनैतिकता और भी जगह है - मात्र जानवरों में ही नहीं मनुष्यों में भी है। समाज में कोई अध्यक्ष की पदवी हो तो उसमें भी एक व्यक्ति दूसरे को हटाने के लिये और कुर्सी पाने के लिये अनेक दुष्कर्म करता है।
दुनिया में वस्तुयें तो सीमित हैं, और लोगो की इच्छायें असीम हैं, अतः यह समस्या सारी जगह है।
एक ही वस्तु की इच्छा जब दो या दो से अधिक लोग कर लेते हैं, तो समस्या हो जाती है। उसमें उन लोगो में संघर्ष शुरु हो जाता है क्योंकि वस्तु तो एक को ही मिल सकती है।
यह समस्या अनेक रूपों में हमे दिखाई देती है। जैसे
- प्रधानमंत्री की गद्दी एक है, और उसे चाहने वाले अनेक प्रत्याशी है।
- पाकिस्तान एक है। अमेरिका की पाकिस्तान से अपने कुछ अपेक्षायें है, चीन के कुछ ओर, भारत की कुछ ओर, तालिबान की कुछ ओर, और पाकिस्तान के खुद भी कुछ इच्छायें हैं।
- पारिवारिक स्तर पर भी बेटे से मां और बाप की अपेक्षाओं में मतभेद हो जाता है। बाप चाहता है कि बेटा इंजीनोयर बने, और बेटा डाक्टर बनना चाहे।
- अयोध्या एक है, और उस पर हक जमाने वाले अनेक समुदाय हैं।
- मैं चाहता हूं कि शरीर स्वस्थ रहे, और शरीर स्वास्थ ना होने की अपस्था में है।
- कम्पनियों में किस प्रकार से आमदनी ज्यादा हो इस बारे में मलिकों की विचारधाराओं में संघर्ष हो सकता है।
हम विचार करें तो देखेंगे यह एक मूलभूत समस्या है इस दुनिया में। एक ही वस्तु पर लोगो की नाना प्रकार की अपेक्षायें हो सकती हैं, और इसका देखो तो मूलतः कोई समाधान नहीं है - क्योंकि सबकी अपेक्षायें अलग अलग दिशाओं में है।
अतः यह निष्कर्ष निकला : जहां जहां लोभ है, इच्छा है, अपेक्षायें हैं, वहां वहां लङाई है, झगङा है।
एक सीधा समाधान तो यह है कि जिस चीज के बिना हमारा काम चल सकता है, उसकी इच्छा को हम छोङ सकते है - तो ये झगङा खतम। और हम इसी में खुशी मानले कि हमारी इच्छा के त्याग से दूसरे को तो खुशी मिल गयी। शायद ऐसा करने से आधे से ज्यादा झगङे समाप्त हो जाये। हम संसारी लोगो के लिये तो ऐसा कर ही सकते हैं।
अगले स्तर पर साधू होते हैं जो सारी ही इच्छाओं को जीत लेते हैं, और सारे झगङो से दूर हो जाते हैं।
Friday, February 19, 2016
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इच्छा और अपेक्षा
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