सूत्र २: जो हुआ सो न्याय
दूसरो को देखकर जो प्रकार के विकल्प होते है उसका समाधान है प्रभु द्वारा बताया गया सत्य - ’जो हुआ सो न्याय’
(क) दुनिया में हमें लगता कि इसने हमारे साथ बङा ही अच्छा किया, या बहुत ही बुरा किया।
इस पर विचार करे कि वास्तव में ऐसा है क्या? वास्तव में कोई हमारा अच्छा या बुरा नहीं करता। दुनिया में जीव की यात्रा बहुत बङी है। अनादि अनन्त काल की है। इस प्रकार की यात्रा विश्व में समस्त जीवो की है। सब जीवो की एक ही कहानी है- चाहे हम माने या ना माने। इस यात्रा में सब कोई जीव अपना किया करा ही भोगते हैं। कोई किसी को सुखी या दुखी नहीं कर सकता है। कोई किसी को सुखी या दुखी कर सके तो यह तो प्रकृति का अन्याय होगा। जिसने जितने गलत काम किये उसे या तो उसे भोगने होंगे या तप के द्वारा भस्म करने होंगे- उसके बिना किसी के द्वारा वो समाप्त कर दियी जायें, तो यह तो प्रकृति का अन्याय होगा, और यह प्रकृति को स्वीकार नहीं। प्रकृति की न्याय का तराजू एकदम सटीक न्याय अनादि काल से करता आ रहा है, और करता रहेगा।
इसके लिये एक उदाहरण लेते हैं- जैसे हमने खूब पैसा कमाया और निकट के बैंक में जमा करा दिया। जब बैंक में पैसा जमा करने गये तब किसी कैशियर ने बैक में हमारा पैसा जमा करवा दिया। अब १० साल बाद हम जब बैंक में गये तो पाया कि कैशियर बदल गया। मगर इस कैशियर ने मेरा पैसा मुझे दे दिया क्योंकि जमा पैसा मेरा था। इसी प्रकार जब हमने भूतकाल में अच्छे-बुरे भाव किये तो भविष्य में किसी निमित्त से अपने को अच्छी बुरी परिस्थितियां बनी। तो उस निमित्त ने मेरे को सुख-दुख नहीं दिया। ये तो उसने मेरा किया कराया ही मुझे दिया। तो जो हुआ सो न्याय ही हुआ। दूसरा व्यक्ति तो मात्र दुख सुख देने का निमित्त बना जैसे कि कैशियर हमें पैसा देने का।
इस बात से हमें ये समझ में आ गया कि कोई भी व्यक्ति या वस्तु मेरे लिये बुरी अच्छी नहीं है। चाहें वो मेरा घर, पति, पत्नि, सास, ससुर, भाई, बहन, दोस्त इत्यादि भी क्यों ना हो। इसलिये, इस बात को गांठ बांध लें - जो हुआ सो न्याय।
(ख) दूसरे की गलत चेष्टाओं को देखके ऐसा लगना कि कितना गन्दा व्यक्ति है।
एक उदाहरण लें- मान लो कि हमने देखा कि समाज की एक बङे बुजुर्ग ने कहा - ’अच्छा हुआ यहां मन्दिर का निर्माण नहीं हुआ’। उसे सुनते ही हमारे मन में उठा कि देखो कैसे अन्यायपूर्ण बात करते हैं। मन्दिर से तो कितनी प्रभावना होती है, कितने लोगो को सुख की प्रप्ति होती है। इनका यह कहना तो एकदम अन्याय पूर्ण है, और मन ही मन में थोङा गुस्सा भी आया कि इतने बुजूर्ग होते हुये भी ऐसी अनुचित बात इन्होने कही। बाद में पता पङा कि ये व्यक्ति तो दिमाग के मरीज है, और बङी ही करूणाजनक अवस्था में हैं। ऐसा सुनते ही पता नहीं गुस्सा तो कहां चला गया, और मन में उनके प्रति करूणा भी आ गयी।
इस उदाहरण से एक बात तो समझने में आयी कि जब हमें कोई चीज न्यायपूर्ण लगती है, तो हमें उसके प्रति दुर्भावनायें नहीं रहती। वास्तव में देखा जायें तो जब हमें घटना न्याय पूर्वक लगती है तो अन्ततया हमें कोई भावनायें ही नहीं रहती, हम मध्यस्थ हो जाते हैं। अन्यायपूर्ण बात पर दुर्भावनायें रखना और बिना उम्मीद के कोई अच्छी घटना के होने पर सुखद भवनायें रखना ही लोक में दिखाई देता है।
अब हम एक उदाहरण और लेते हैं, और उसका तात्विक दृष्टि से विशलेषण करते हैं: एक व्यक्ति हमारे गांव में आया। पता पङा पहुंचे हुवे सन्त हैं। जाकर मिले तो पता पङा कि बाहर से सन्त हैं और अन्दर से पाखण्डी। ऐसा पता पङते ही मन में द्वेष की नाना प्रकार की तरंगे नृत्य करने लगी। लौकिक ज्ञान से तो ये ही पता पङता है कि ये व्यक्ति बहुत गन्दा है। मगर तात्विक दृष्टि से देखा तो पता पङा कि उसका पाखण्ड का कारण तो उसका अज्ञान और कषाय हैं। और ये अज्ञान, कषाय का कारण तो पूर्वजन्म में किये गये भाव हैं। अब समझ में आया जैसा सन्त की अज्ञान, कषाय की अवस्था है, तो उसी के हिसाब से तो कर रहा है, इसीलिये न्यायपूर्ण है। द्वेष करूं तो किस पर करू? उस सन्त की अज्ञान और कषाय पर? मगर उस पर भी कैसे करू, उसका मूल कारण तो भूतकाल में किया गया वो भाव है जिससे इस प्रकार का अज्ञान, कषाय सन्त मे अभी दिखाई पङ रहे है। तो भूतकाल के भाव पर करूं? उस पर भी कैसे करू उसका भी तो कारण उसके भूतकाल में कुछ है। तो मतलब कषाय ही ना करूं। हां! बस यही इष्ट है!
मगर जो कर रहा है, उसके फ़ल में इसे भविष्य में दुख होगा, इसीलिये मन में करूणा भी है। मगर जो कर रहा है, वो अब अन्याय नहीं दिखेगा। इस प्रकार से सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड में समस्त जीवो की नाना प्रकार की अवस्थायें न्यायपूर्ण दिखाई पङती है। चाहें वो भ्रष्ट नेता, आतंकवादी, पाखण्डी सन्त इत्यादि क्यों ना हो। जगत मे अन्याय नाम की कोई चीज नहीं। जो गलत कार्य करता है, उसे भविष्य में उससे दुख ना हो इसीलिये उसे सम्बोधा जाता है। यह बात समझके अपने को सब व्यक्ति के प्रति- यह अच्छा है, यह बुरा है- इस प्रकार की भवनाओं का अन्त हो जाता है।
ऐसी दृष्टी बनने से ना तो हम राग करते हैं और ना द्वेष और शान्ति को प्राप्त करते हैं। अगर बाहर कमीयां दिखे तो उसे न्यायपूर्ण देखे, अगर अच्छाईयां दिखे तो उसे न्यायपूर्ण देखें, इस प्रकार से बाहर में अच्छे बुरे के भेद करने की दृष्टी समाप्त हो जाती है, और समता दृष्टी पैदा होती है।
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