Thursday, February 10, 2022

षटकारक (षट्कारक)

 कारक – 

  • क्रिया के कर्त्ता को कारक कहते हैं। जिन शब्दों का क्रिया के साथ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंध होता है उन्हें कारक कहा जाता है अर्थात क्रिया को करने वाला कारक कहलाता है।

  • क्रिया की सिद्धि में सहायक को कारक कहा जाता है। इस परिभाषा के अनुसार संबंध व संबोधन का क्रिया के साथ प्रत्यक्षतः कोई संबंध नहीं होता है, अतः ये कारक के अंतर्गत नहीं आते हैं किंतु इनका व्यवहार कारकों के समान ही होता है, इसीलिए इनकी गणना कारकों में की जाती है।


कारक के लक्षण:


कारक

लक्षण

कर्ता

क्रिया के करने वाला

कर्म

जब क्रिया का फल कर्त्ता पर न पड़कर, अन्य किसी संज्ञा या सर्वनाम पर पड़ता है, इसे कर्म कारक कहते हैं।

करण

क्रिया की सिद्धि (सफलता) में कर्त्ता कि जो सबसे अधिक सहायता करता है, उसे करण कारक कहते हैं। दूसरे शब्दों में जो क्रिया का साधन होता है, उसे करण कारक कहते हैं।

संप्रदान

सम्प्रदान का अर्थ है – देना। कर्त्ता जिसके लिए काम करता है या जिसे कुछ देता है, उसे संप्रदान कारक कहते हैं।

अपादान

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रुप से अलग होने, तुलना करने, अतिरिक्त निकलने, डरने, लज्जित होने, दूरी होने आदि के भाव प्रकट हो, उसे अपादान कारक कहते हैं।

अधिकरण 

किसी वस्तु के रहने बैठने या ठहरने के आधार (Base) को अधिकरण कहते हैं। जिन संज्ञा शब्दों के द्वारा क्रिया के आधार का ज्ञान होता है वे अधिकरण कारक कहे जाते हैं।



व्यवहार षट्कारक

निश्चय षट्कारक

  • जिस जगह परके निमित्तसे कार्यकी सिद्धि कीजाय

  • उपचार असद्भूतनयकर सिद्धि किये जाते हैं, इस कारण असत्य हैं

  • जिस जगह अपने में ही अपनेको उपादान कारण कर अपने कार्यकी सिद्धि कीजावे,

  • अपनेमें ही जोड़े जाते हैं, इसलिये सत्य हैं। क्योंकि वास्तव में कोई द्रव्य किसी द्रव्यका कर्ता व हर्ता नहीं है, इसलिये व्यवहारकारक असत्य है, अपनेको आप ही करता है, इस कारण निश्चयकारक सत्य है । 




व्यवहार कारक झूठा क्यों?:


कारक

लक्षण

कर्ता

क्रिया के करने वाला

कर्म

जब क्रिया का फल कर्त्ता पर ही पङता है। अतः वह ही कर्म है। वह अन्य द्रव्य के लिये निमित्त बन जाता है। और उनके उपदान शक्ति से उनमें परिणमन होता है।

करण


संप्रदान


अपादान


अधिकरण 





कारक

व्यवहार

निश्चय

कर्ता

कुंभकार (कुम्हार ) कर्ता है

मृत्तिकाद्रव्य (मट्टी) करता है, 

कर्म

घड़ारूप कार्यको करता है, इससे घट कर्म है

अपने घट परिणाम कर्मको करता है, इसलिये आप ही कर्म है,

करण

दंड चक्र चीवर ( डोरा ) आदिकर यह घट कर्म सिद्ध होता है, इसलिये दंड' आदिक करण कारक हैं

आप ही अपने घट परिणामको सिद्ध करता है, इसलिये स्वयं ही करण है, 

संप्रदान

जल वगैरःके भरनेके लिये घट' दिया जाता है, इस लिए संप्रदानकारक है

अपने घट परिणामको करके अपनेको ही सौंप देता है, इस कारण आप ही संप्रदान है।

अपादान

मिट्टीकी पिंडरूपादि अवस्थाको छोड़ घट अवस्थाको प्राप्त होना अपादानकारक है

अपनी मृत्पिड अवस्थाको छोड़ अपनी घट अवस्थाको करता है, इसलिये आप ही अपादान है। 

अधिकरण 

भूमिके आधारसे घटकर्म किया जाता है, वनाया जाता है, इसलिये भूमि अधिकरणकारक समझना

अपनेमें ही अपने घटपरिणामको करता है, इसलिये आप ही अधिकरण है।


यह आत्मा संसार अवस्थामें जव शुद्धोपयोगभावरूप परिणमन करता है, उस समय किसी दूसरेकी सहायता (मदद) न लेकर अपनी ही अनंत शुद्धचैतन्यशक्तिकर आप ही छह कारकरूप होके केवलज्ञानको पाता है, इसी अवस्थामें 'स्वयंभू' कहा जाता है।

कारक

लक्षण

कर्ता

शुद्ध अनंतशक्ति तथा ज्ञायकस्वभाव होनेसे अपने आधीन होता हुआ यह आत्मा अपने शुद्ध ज्ञायकस्वभावको करता है, इसलिये आप ही कर्ता है

कर्म

जिस शुद्धज्ञायकस्वभावको करता है, वह आत्माका कर्म है, सो वह कर्म आप ही है, क्योंकि शुद्ध-अनंतशक्ति, ज्ञायक खभावकर अपने आपको ही प्राप्त होती है, वहाँ यह आत्मा ही 'कर्म' है

करण

अपने शुद्ध आत्मीक परिणामकर स्वरूपको साधन करता है, वहाँपर अपने अनंतज्ञानकर 'करणकारक' होता है

संप्रदान

यह आत्मा अपने शुद्धपरिणामोंको करता हुआ अपनेको ही देता है, उस अवस्थामें शुद्ध अनंतशक्ति ज्ञायकस्वभाव कर्मकर आपको ही स्वीकार करता हुआ 'संप्रदानकारक होता है

अपादान

यह आत्मा जव शुद्ध स्वरूपको प्राप्त होता है, उस समय इस आत्माके सांसारीक अशुद्ध-क्षायोपशमिक मति आदि ज्ञानका नाश होता है, उसी अवस्थामें अपने स्वाभाविक ज्ञानखभावकर स्थिरपनेको धारण करता है, तव 'अपादानकारक होता है।

अधिकरण 

यह आत्मा जव अपने शुद्धअनंतशक्ति ज्ञायकखभावक्य आधार है, उस दशामें 'अधिकरणकारक'को स्वीकार करता है। 


Jeev aur karma me shatkaarak - Panchastikaaya Gatha 61-62 se


कारक

जीव

कर्म

कर्ता

जीवमय कर्ता-रूप आत्मा भी

कर्ता-रूप कर्म-पुद्गल

कर्म

कर्मता को प्राप्त आत्मा को

कर्मता को प्राप्त कर्म पुद्गल को

करण

करण-भूत आत्मा द्वारा

करण-भूत कर्म-पुद्गल द्वारा

संप्रदान

निमित्त (सम्प्रदान) रूप आत्मा के लिए

निमित्त (सम्प्रदान) रूप कर्म पुद्गल के लिए

अपादान

अपादान-रूप आत्मा से

अपादान-रूप कर्म-पुद्गल से

अधिकरण 

अधिकरण-भूत आत्मा में करता है


अधिकरण-भूत कर्म-पुद्गल में


Friday, February 4, 2022

पर्याय बुद्धि: पज्जयमूढा हि परसमया

 ’वह गुस्सैल है’ - यह दूसरे की पर्यायगत अवस्था है। मगर ऐसा समझ लिया जाता है कि वो तो गुस्सैल ही है। जबकि उसका स्वभाव तो पारिणामिक भाव (जीवत्व) भाव है। गुस्सैल स्वभाव तो पर्यायगत अवस्था है। ऐसा समझने से हम दूसरे को गुस्सैल पर्याय अपेक्षा ही लेंगे। द्रव्य अपेक्षा उसका स्वभाव तो जीवत्व रूप  है, और वो एकदम वैसा ही है जैसा मेरा है। ऐसे अनेकान्त से हमरा संक्लेश कम होता है और उसे एकान्त से गुस्सैल नहीं मानते।


इसी प्रकार अपनी बुद्धि, शरीर आदि पर्याय को अपना स्वभाव आदि मान लेना भी गलत है। और दुख प्रदान करने वाला है।


यह दोनो प्रकार की पर्याय पर लेना है - गुण पर्याय और द्रव्य पर्याय।

Friday, January 28, 2022

भोक्तृत्व

*पर भोक्तृत्व का उदाहरण*:

- मैंने विषय को भोगा


*स्व भोक्तृत्व*:

- मैने अपने परिणाम को ही भोगा। उसमें उपादान कारण मैं था, और पर पदार्थ उसमें निमित्त कारण था।


*पर भोक्तृत्व में भूल*:

- अपने उपादान कारण और अन्य निमित्तो को गौण करके, मेरे भोगने में सारा कारण पर पदार्थ पर डाल दाना।


*पर कर्तत्व से नुकसान*:

- मैने अपने परिणमन में दूसरे को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। अपने भोक्तृत्व के अर्जन, संरक्षण, विनाश में संक्लेश प्राप्त करता है। मैं इस सुख को ऐसे ही भोगता रहूं, ये दुख मेरा नष्ट हो जाये, मुझी ऐसा सुख ओर मिल जाये - इन्ही विकल्पो में घूमता रहता है। और अपने सच्चे सुख को भोगने का पुरूषार्थ नहीं करता।

Note: मुझे जब कोई चीज लगती है - कि यह मेरी है। तभी मुझे उसमें कुछ करने का .. उसमें सुधार करने का.. या उससे सुख प्राप्त करने का विकल्प जागता है। यही कर्म चेतना और कर्मफ़ल चेतना को जन्म देती है, और कर्म बन्धन करवाती है।


 

कर्तत्व

 *पर कर्तत्व का उदाहरण*:

- मैने उस व्यक्ति को सुधारा

*स्व कर्तत्व*:

- मैने अपना योग उपयोग किया, और उसके निमित्त से वाणी की क्रिया हुई, उसके निमित्त से और व्यक्ति अपने उपादान कारण से  सुधरा।


*पर कर्तत्व में भूल*:

- व्यक्ति के उपादान कारण को गौण करके, सारा कर्तत्व खुद पर ले लिया।

- मेरे अलावा अन्य निमित्त कारणो को गौण करके सारा कर्तत्व खुद पर ले लिया।


*पर कर्तत्व से नुकसान*:

- ’मैने सुधारा’ - मैने अपने को सुधारने का स्वामी मान लिया। कर्तत्व के अर्जन, संरक्षण, विनाश में संक्लेश प्राप्त करता है। मैं ऐसा ओर करूं, करता रहूं, इसे करने से आनन्द नहीं है- इसलिये ये ना करू - इन्ही में लीन रहता है।  ये एक प्रकार की मूर्छा है। ऐसे ही औरो को सुधारने के भाव में(अर्जन), जिसको सुधारा है उसके रक्षण में, जिसको सुधारा है उसके बिगङ जाने में क्लेश को प्राप्त हूंगा।


Example: Jab tak mein sochta hun ki meine putra ko paida kiya.. tab tak uske prati raag naheen khatam ho sakta

Tuesday, January 11, 2022

Learning from research in NDE

 Source: https://www.youtube.com/watch?v=2MMJPjnShZs

NDEs suggest:

  • Existence of soul
  • Existence of extra sensory knowledge: See the examples where the soul goes and meet someone, find some things while his physical senses were still lying in hospital. This also supports that extra sensory knowledge exist, and Avadhi Gyaan, Manah Prayay Gyaan, Kewal Gyaan can exist
  • Existence of life outside earth: See the examples where the soul goes and meet someone who is already dead and find something which the person did not know before and gets validated when soul comes back to body.
  • No pain once the soul was out: There was not pain left when the soul was having NDE! This is interesting to note.

Friday, September 10, 2021

ज्योतिष और अध्यात्म

 ज्योतिष का ज्ञान धर्म की वृद्धि में कैसे सहायक है:

कर्म की सत्ता में विश्वास: कर्म दिखाई नहीं देता, इसलिये उस पर विश्वास करना भी कठिन रहता है। मगर ज्योतिष में किसी के जीवन के बारे में उसके जन्म समय में ग्रह और नक्षत्रो की स्थिति के आधार पर भविष्यवाणी करी जा सकती है। इसके पीछे क्या आधार है? जब यह चिन्तन करते हैं, तो एक कर्म व्यवस्था पर ही विश्वास करना पङता है।

सहिष्णुता में वॄद्धि: हम दूसरे लोगो के कुसंस्कार और अन्य बाते देखके असहिष्णु हो जाते हैं। मगर कुण्डली के द्वारा दूसरे व्यक्ति के संस्कार दिखाई पङते हैं, जो वो पिछले भव से लेके आया है। इसे देखके हम अनेक प्रकार के व्यक्तियों के प्रति सहिष्णु हो जाते हैं।

विनम्रता: कई बार हम अपने को बहुत बढ़िया समझते हैं, और वो अज्ञान भी होता है। मगर कुण्डली विश्लेषण से हमे अपने से भी अच्छे लोग दिखाई देते हैं। अपने मान वश हो सकता है हम उनके गुणो के प्रति नम्र ना हो रहे हैं - मगर कुण्डली तो एक गणित की तरह है- ये हमें नम्रीभूत करता है।

अपनी कमियों का  भान: कई बार हम अपनी कमियों को कमी नहीं मान पाते। जैसे किसी व्यक्ति को बाल की खाल निकालने की आदत हो, मगर वो इसे अपनी कमी ना मानकर यह मानता हो कि- ’मेरे अन्दर विश्लेषण करने की शक्ति बहुत है’। इस प्रकार के भ्रम को कुण्डली से जाना जा सकता है। साथ में कोई व्यक्ति अपने को बहुत धर्मात्मा अगर समझे, तो वो अपने को कुण्डली के आधार पर देख सकता कि वो वास्तव में कितना धर्मात्मा है और भ्रम को सही कर सकता है।

धर्म में प्रगति: 9, 12, 1 आदि भावो के द्वारा देखा जा सकता कि धर्म की प्रगति में क्या बाधा हो सकती है। उसके लिये मंत्र जाप द्वारा उसका समाधान भी किया जा सकता है।

मोक्ष की रूचि: अपने कर्मो का लेखा जोखा का अन्देशा कुण्डली के द्वारा हो जाता है, और इस प्रकार इन कर्मो से मुक्त होने की भावना भी बलवती हो जाती है।

भविष्य में आने वाले कर्मो को बदलना: भविष्य में आने वाले कर्मो के उदय की जानकारी होने से धर्म साधना आदि से उसे बदलने का पुरूषार्थ भी किया जा सकता है।

पाप से भय: ज्योतिष से यह समझ में आता है कि अनेक ग्रह अनेक लोगो से जुङे हैं। जैसे चन्द्रमा के लिये माता, सेवक के लिये शनि  ग्रह, विद्वान के लिये बुद्ध ग्रह आदि। इन लोगो के प्रति सही कर्तव्य ना रखा जाय तो इन ग्रह से अनिष्ट की सम्भावना बन जाती है। ऐसा जानने पर व्यक्ति भय वशात सबके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता है।

इस प्रकार अनेक तरीके से ज्योतिष ज्ञान हमें अध्यात्म में साधन बनता है।

Monday, August 16, 2021

'I love myself' - what does it mean?

 We get to hear a lot about 'I love myself'. It means - not having hatred or ill emotions towards the body, mind and other things life has brought to me.

Because of my karma, I may have got good or bad stuff. The wisdom lies in not having any hate toward it, and working towards a solution. And realizing that hate does not serve any purpose. In other words - 'approving the way things are'.

The first step to solve any problem is to get rid of any 'dwesh' towards it, and then work on it.

इच्छा और अपेक्षा

 🌿 *इच्छा और अपेक्षा* 🌿 1️⃣ इच्छा क्या है? इच्छा एक कामना है — किसी बात के होने की सरल अभिलाषा। जैसे — > “मुझे अच्छा स्वास्थ्य चाहिए।” ...