हम आस पास जी जितनी भी चीजे देखते हैं, वो अन्य अनेक वस्तुओं से मिलकर बनी हैं। टेलीविजन है, वो अनेक प्रमाणुओं से मिलकर बना है। देखने में तो टेलीविजन एक वस्तु लगता है, मगर वास्तव में वो अनगनित परमाणुओं से मिलकर बनी है। वो सब परमाणु अलग अलग भी हो सकते हैं, और फ़िर दुबार मिलकर कोई नयी चीज भी बना सकते हैं - जैसे शीशम का पेङ। और चाहे वो स्वतन्त्र रूप में भी वो अनगनित परमाणु रह सकते हैं।
अब देखते हैं इन्सान को। वो भी अनगनित परमाणु और एक आत्मा से मिलकर बना है। शरीर तो आता जाता रहता है। मरते ही पूरा का पूरा शरीर एक ही झटके में अलग हो जाता है, फ़िर नया मिल जाता है। मतलब नया शरीर मिलता रहता है और पुराना बिछुङता रहता है। और ये शरीर के साथ ही नहीं - बल्कि राग-द्वेष के साथ भी है। क्रोध खत्म होता है तो लोभ आ जाता है। मान जाता है भय आ जाता है। जैसी टेलीविजन में हमने सारे परमाणुओं के अलग होने की कल्पना करी, ऐसी कल्पना अगर हम एक क्षण के लिये उस इन्सान के लिये करें।
उसका पूरा शरीर उससे अलग हो जाय। क्रोध, मान वगैरह जो आते जाते रहते हैं, ये भी उससे अलग हो जाये, तो क्या बचेगा? क्या सोचा है कभी आपने? कैसी अवस्था होगी वो?
वो है मोक्ष! जहां मात्र ज्ञान है और आनन्द।
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