"In this world everybody has some kind of suffering or the other. If you think you are suffering because you lack one thing, then you should look around and you would not find anybody with everything. One can have lot of things but not everything. There is difference in having lot of things than everything.
We can spend our whole life to fill those gaps - but not able to finish all those gaps. Therefore we should not get affected with gaps rather we should accept what we have.
Those who understand the reality of world, they are able to win over their expectations. All these expectations are meaningless. Expectations from others only bring suffering. We think once we fill those gaps we will be happy, but in reality we will never be happy. One who is not satisfied with his present, how can he be satisfied with his future.
We should accept what we have. Suffering is an essential element in this world ( Samsara). It depends on us whether we suffer it by crying or by becoming unaffected." - translated from discourses by Muni Shri Praman Sagar Ji
Sunday, February 21, 2016
Friday, February 19, 2016
About Greed
मैं गुजरात में तारंगा नाम के स्थान में गया। वहां एक पुरूष के एक रोटी लंगूर को खाने को दी। लंगूर ने रोटी को मूंह में डाला, और जब वह रोटी आधी उसके मूंह में और आधी बाहर थी, तभी एक दूसरा लंगूर आया और उस रोटी को अपने हाथ से छीनकर भागता चला। मुझे देखके ऐसा लगा कि देखो इन लंगूरो में नैतिकता का इतना अभाव है कि दूसरे के मूंह से रोटी तक ये छीन लेते हैं।
कुछ दिनो बाद मैं अपने शहर सहारनपुर आया और वहां भी एक घटना देखी। एक वुढ़िया रोटी दूध में डालकर एक कमजोर कुत्ते के लिये लायी। और उसने दूध में डूबी रोटी नीचे फ़र्श पर कुत्ते के लिये डाली। और तभी एक दूसरा ताकतवर कुत्ता दूर से भौंकते और गुर्राते हुवे आया, और उससे डरके कमजोर कूत्ता दूर भागने लगा। ताकतवर कुत्ता आके वह रोटी खाने लगा। बुढिया ने ताकतवर कुत्ते को धमकाया, मगर उसे इसका कोई असर नहीं पढ़ा। वो पूरी रोटी खा गया, और बुढ़िया दुखी होकर चली गयी। अब मैने समझा कि नैतिकता की कमी मात्र लंगूरो में ही नहीं बाकी जानवरो में भी है।
कुछ दिनो बाद और विचार आये तो ऐसा लगा कि यह अनैतिकता और भी जगह है - मात्र जानवरों में ही नहीं मनुष्यों में भी है। समाज में कोई अध्यक्ष की पदवी हो तो उसमें भी एक व्यक्ति दूसरे को हटाने के लिये और कुर्सी पाने के लिये अनेक दुष्कर्म करता है।
दुनिया में वस्तुयें तो सीमित हैं, और लोगो की इच्छायें असीम हैं, अतः यह समस्या सारी जगह है।
एक ही वस्तु की इच्छा जब दो या दो से अधिक लोग कर लेते हैं, तो समस्या हो जाती है। उसमें उन लोगो में संघर्ष शुरु हो जाता है क्योंकि वस्तु तो एक को ही मिल सकती है।
यह समस्या अनेक रूपों में हमे दिखाई देती है। जैसे
- प्रधानमंत्री की गद्दी एक है, और उसे चाहने वाले अनेक प्रत्याशी है।
- पाकिस्तान एक है। अमेरिका की पाकिस्तान से अपने कुछ अपेक्षायें है, चीन के कुछ ओर, भारत की कुछ ओर, तालिबान की कुछ ओर, और पाकिस्तान के खुद भी कुछ इच्छायें हैं।
- पारिवारिक स्तर पर भी बेटे से मां और बाप की अपेक्षाओं में मतभेद हो जाता है। बाप चाहता है कि बेटा इंजीनोयर बने, और बेटा डाक्टर बनना चाहे।
- अयोध्या एक है, और उस पर हक जमाने वाले अनेक समुदाय हैं।
- मैं चाहता हूं कि शरीर स्वस्थ रहे, और शरीर स्वास्थ ना होने की अपस्था में है।
- कम्पनियों में किस प्रकार से आमदनी ज्यादा हो इस बारे में मलिकों की विचारधाराओं में संघर्ष हो सकता है।
हम विचार करें तो देखेंगे यह एक मूलभूत समस्या है इस दुनिया में। एक ही वस्तु पर लोगो की नाना प्रकार की अपेक्षायें हो सकती हैं, और इसका देखो तो मूलतः कोई समाधान नहीं है - क्योंकि सबकी अपेक्षायें अलग अलग दिशाओं में है।
अतः यह निष्कर्ष निकला : जहां जहां लोभ है, इच्छा है, अपेक्षायें हैं, वहां वहां लङाई है, झगङा है।
एक सीधा समाधान तो यह है कि जिस चीज के बिना हमारा काम चल सकता है, उसकी इच्छा को हम छोङ सकते है - तो ये झगङा खतम। और हम इसी में खुशी मानले कि हमारी इच्छा के त्याग से दूसरे को तो खुशी मिल गयी। शायद ऐसा करने से आधे से ज्यादा झगङे समाप्त हो जाये। हम संसारी लोगो के लिये तो ऐसा कर ही सकते हैं।
अगले स्तर पर साधू होते हैं जो सारी ही इच्छाओं को जीत लेते हैं, और सारे झगङो से दूर हो जाते हैं।
कुछ दिनो बाद मैं अपने शहर सहारनपुर आया और वहां भी एक घटना देखी। एक वुढ़िया रोटी दूध में डालकर एक कमजोर कुत्ते के लिये लायी। और उसने दूध में डूबी रोटी नीचे फ़र्श पर कुत्ते के लिये डाली। और तभी एक दूसरा ताकतवर कुत्ता दूर से भौंकते और गुर्राते हुवे आया, और उससे डरके कमजोर कूत्ता दूर भागने लगा। ताकतवर कुत्ता आके वह रोटी खाने लगा। बुढिया ने ताकतवर कुत्ते को धमकाया, मगर उसे इसका कोई असर नहीं पढ़ा। वो पूरी रोटी खा गया, और बुढ़िया दुखी होकर चली गयी। अब मैने समझा कि नैतिकता की कमी मात्र लंगूरो में ही नहीं बाकी जानवरो में भी है।
कुछ दिनो बाद और विचार आये तो ऐसा लगा कि यह अनैतिकता और भी जगह है - मात्र जानवरों में ही नहीं मनुष्यों में भी है। समाज में कोई अध्यक्ष की पदवी हो तो उसमें भी एक व्यक्ति दूसरे को हटाने के लिये और कुर्सी पाने के लिये अनेक दुष्कर्म करता है।
दुनिया में वस्तुयें तो सीमित हैं, और लोगो की इच्छायें असीम हैं, अतः यह समस्या सारी जगह है।
एक ही वस्तु की इच्छा जब दो या दो से अधिक लोग कर लेते हैं, तो समस्या हो जाती है। उसमें उन लोगो में संघर्ष शुरु हो जाता है क्योंकि वस्तु तो एक को ही मिल सकती है।
यह समस्या अनेक रूपों में हमे दिखाई देती है। जैसे
- प्रधानमंत्री की गद्दी एक है, और उसे चाहने वाले अनेक प्रत्याशी है।
- पाकिस्तान एक है। अमेरिका की पाकिस्तान से अपने कुछ अपेक्षायें है, चीन के कुछ ओर, भारत की कुछ ओर, तालिबान की कुछ ओर, और पाकिस्तान के खुद भी कुछ इच्छायें हैं।
- पारिवारिक स्तर पर भी बेटे से मां और बाप की अपेक्षाओं में मतभेद हो जाता है। बाप चाहता है कि बेटा इंजीनोयर बने, और बेटा डाक्टर बनना चाहे।
- अयोध्या एक है, और उस पर हक जमाने वाले अनेक समुदाय हैं।
- मैं चाहता हूं कि शरीर स्वस्थ रहे, और शरीर स्वास्थ ना होने की अपस्था में है।
- कम्पनियों में किस प्रकार से आमदनी ज्यादा हो इस बारे में मलिकों की विचारधाराओं में संघर्ष हो सकता है।
हम विचार करें तो देखेंगे यह एक मूलभूत समस्या है इस दुनिया में। एक ही वस्तु पर लोगो की नाना प्रकार की अपेक्षायें हो सकती हैं, और इसका देखो तो मूलतः कोई समाधान नहीं है - क्योंकि सबकी अपेक्षायें अलग अलग दिशाओं में है।
अतः यह निष्कर्ष निकला : जहां जहां लोभ है, इच्छा है, अपेक्षायें हैं, वहां वहां लङाई है, झगङा है।
एक सीधा समाधान तो यह है कि जिस चीज के बिना हमारा काम चल सकता है, उसकी इच्छा को हम छोङ सकते है - तो ये झगङा खतम। और हम इसी में खुशी मानले कि हमारी इच्छा के त्याग से दूसरे को तो खुशी मिल गयी। शायद ऐसा करने से आधे से ज्यादा झगङे समाप्त हो जाये। हम संसारी लोगो के लिये तो ऐसा कर ही सकते हैं।
अगले स्तर पर साधू होते हैं जो सारी ही इच्छाओं को जीत लेते हैं, और सारे झगङो से दूर हो जाते हैं।
Monday, February 1, 2016
अनुकूलता और प्रतिकूलता
एक कहानी:
मैने मन्दिर में एक ताई जी से सौ रूपये उधार लिये, और कहा कि एक हफ़्ते बाद लौटा दूंगा। १-२ दिन बाद मन में हुआ कि लौटाना ना पङे तो ज्यादा अच्छा। मन्दिर तो रोज जाता था और ताई जी मिलती थी। अब रूपये लौटाने का मन नहीं था तो मैने आंखे बचाना शुरू कर दी। जब भी ताई जी को देखता तो इधर उधर हो लेता। और मन में ही डर और थोङी चिन्ता भी शुरू हो गयी- अगर ताई जी ने मुझे देख लिये और पैसे मांगे तो क्या जवाब दूंगा? अगर ताई जी ने किसी और को ये बात बता दी तो क्या होगा?
मेरा एक दूसरा मित्र भी था, उसने भी ताई जी से पैसे उधार लिये और एक हफ़्ते का वायदा किया और २ दिन में ही लौटा दिया।
अब ये ही बात जीवन में लागू होती है। हम दूसरो को दुख देते हैं, और जब उसका फ़ल हमें मिलता है तो उससे डरते हैं, और चिन्तित होते हैं। जबकि ज्ञानी लोग फ़ल को सहर्ष रूप से स्वीकार करने को तैयार रहते हैं, जैसा कि मेरे मित्र ने किया।
होना तो यह चाहिये कि हम प्रतिकूलताओं को आने दें क्योंकि वे हमारे पुराने कर्मो के आधार पर ही आ रहें है, जबकि हम उनसे चिन्तित हो जाते हैं, और डरने लगते हैं।
दुनिया में उसे बहादुर कहते हैं जो प्रतिकूलताओं से लङकर उन्हे अनुकूलता में बदल दे, मगर वास्तविकता में तो बहादुर वह है जो प्रतिकूलता होने पर भी अपने मन को सम्भाल ले।
इसलिये कहते हैं:
⦁ जब किसी से पैसे लिये है तो वापस करने पङेंगे - ऐसे ही जब किसी को दुख दिया तो दुख झेलना भी पङेगा।
⦁ प्रतिकूलता को समता से सहे बगैर परमात्मा के शासन में जाना संभव नहीं।
⦁ कष्टसहिष्णु बनो।
मैने मन्दिर में एक ताई जी से सौ रूपये उधार लिये, और कहा कि एक हफ़्ते बाद लौटा दूंगा। १-२ दिन बाद मन में हुआ कि लौटाना ना पङे तो ज्यादा अच्छा। मन्दिर तो रोज जाता था और ताई जी मिलती थी। अब रूपये लौटाने का मन नहीं था तो मैने आंखे बचाना शुरू कर दी। जब भी ताई जी को देखता तो इधर उधर हो लेता। और मन में ही डर और थोङी चिन्ता भी शुरू हो गयी- अगर ताई जी ने मुझे देख लिये और पैसे मांगे तो क्या जवाब दूंगा? अगर ताई जी ने किसी और को ये बात बता दी तो क्या होगा?
मेरा एक दूसरा मित्र भी था, उसने भी ताई जी से पैसे उधार लिये और एक हफ़्ते का वायदा किया और २ दिन में ही लौटा दिया।
अब ये ही बात जीवन में लागू होती है। हम दूसरो को दुख देते हैं, और जब उसका फ़ल हमें मिलता है तो उससे डरते हैं, और चिन्तित होते हैं। जबकि ज्ञानी लोग फ़ल को सहर्ष रूप से स्वीकार करने को तैयार रहते हैं, जैसा कि मेरे मित्र ने किया।
होना तो यह चाहिये कि हम प्रतिकूलताओं को आने दें क्योंकि वे हमारे पुराने कर्मो के आधार पर ही आ रहें है, जबकि हम उनसे चिन्तित हो जाते हैं, और डरने लगते हैं।
दुनिया में उसे बहादुर कहते हैं जो प्रतिकूलताओं से लङकर उन्हे अनुकूलता में बदल दे, मगर वास्तविकता में तो बहादुर वह है जो प्रतिकूलता होने पर भी अपने मन को सम्भाल ले।
इसलिये कहते हैं:
⦁ जब किसी से पैसे लिये है तो वापस करने पङेंगे - ऐसे ही जब किसी को दुख दिया तो दुख झेलना भी पङेगा।
⦁ प्रतिकूलता को समता से सहे बगैर परमात्मा के शासन में जाना संभव नहीं।
⦁ कष्टसहिष्णु बनो।
Are we drawing lines in water?
Insightful story:
A baby is born - he studies and gets the job and works hard for the rest of his life sincerely. He get married and have kids. He loves his wife and kids and takes care of them with utmost sincerity.
Now he is on his death bed and can leave anytime. He asks the Mother Nature - "I am going to die soon. I have worked with honesty and sincerity my whole life. I love my children and I nurtured them with my best efforts. Now I am going to leave. Is this not your injustice that you do not allow me to take my wealth, wife and children along with me in my next birth?"
The Mother Nature replies - "If you draw lines in water to make a beautiful picture, you will fail. This is not the nature of water to hold your drawings. Similarly the transient nature of life does not let any associations’ lasts forever in the cycle of birth and death. Your desire to let them be permanent is because of your ignorance."
Therefore we need to think - Are we drawing lines in water?
Thursday, June 18, 2015
Interfaith Marriages
In India, traditionally interfaith marriages are not encouraged. Couples with interfaith marriage are more likely to be unhappy and end in divorce or unsuccessful marriage.
Marriage is not just a union of two people, but families. Usually in the youth people feel themselves more secular and ready to go for an interfaith marriage, but as the time proceed with kids and older age, people get to engage themselves in spiritual or religious activities and differences start to show up, which leads to confusion to kids at times, and unhappiness between parents.
For a successful marriage, both wife and husband need to adjust and compromise on various fronts. And if the faith is not common, that makes it even more difficult.
To give some instances:
Marriage is not just a union of two people, but families. Usually in the youth people feel themselves more secular and ready to go for an interfaith marriage, but as the time proceed with kids and older age, people get to engage themselves in spiritual or religious activities and differences start to show up, which leads to confusion to kids at times, and unhappiness between parents.
For a successful marriage, both wife and husband need to adjust and compromise on various fronts. And if the faith is not common, that makes it even more difficult.
To give some instances:
- If husband wants to make a trip to a sacred place, and his wife belongs to the same faith - they can go together to make it a successful trip. And if it is interfaith marriage, they would need to find a company outside home to their trip.
- For every day visit to place of worship it will be seamless to go to the single place, and have a common social life.
- They will have same terminology to talk when they have to talk things beyond the material life.
- Their parents and parents in law will more likely be in sync if it is a same-faith marriage.
Friday, April 10, 2015
Dialogues from movie Happy 2011
From Movie 'Happy':
There is a general lay sense that all adversity is bad. And the scientific research does not really support that. One of the key ingredients to happiness is being able to recover from adversity more quickly. So it's not that the people who are happy don't respond to adversity. They do. They show an appropriate response to adversity. But they come back down to baseline quickly. (Richard J. Davidson)
There is no such thing as pleasure without pain of whatever sort emotional or otherwise. Physical or otherwise. Your nervous system is a differential engine. It looks at differences. It looks at contrasts. That's all it cares about. It integrates information by integrating a bunch of little differences in things. (P. Read Montague)
We are told in our society that the way to be a competent person, the way to be a good person is to make a lot of money. In the last 50 years, economic growth has gone up a lot, but happiness has remains stagnant.(Tim Kasser)
Hedonic adaptation: Whatever level of wealth of material goods you have, you adapt to it and you'll always want more.
We make a distinction between two main kind of goals:
intrinsic goals (like personal growth, close relations, community feeling)
extrinsic goals (focused externally like money, image, status etc)
People who have more extrinsic goals were reprting less satisfaction with their lives. They were more dipressed, more anxious, less energy.
Intrinsic people were more happy and have less anxiety.
http://www.businessinsider.com/extrinsic-goals-are-an-obstacle-to-happiness-2014-7
Gratitude, compassion, caring, love - these are to me what I would call spiritual emotions, and they make you think of things bigger than yourself. If you only seek your own happiness, it can be kind of a selfish thing. But once you move to the spiritual emotions and worry about the well-being of the world, your life grows. You care about something bigger than yourself. You, in a way, can transcend your own life, your own death, by caring these things bigger than yourself.
From Movie 'I AM':
The medical paradigm of our last 30 years has been the body's there to carry the brain around and the brain's in control of everything. Really not that way. 90% to 95% of the nerves are carrying information from the body to the brain and not the brain to the body. So, in reality, the heart send far more information to the brain than the brain sends to the heart.
In a sense, the heart is the boss of us. And they have discovered if you take readings of the interstitial beats of the heart, the pause can tell us what the emotional state a person is in. If the heart is sending stressful or a negative emotion or pattern, that literally inhibits our brain. We can't think clearly. We function better in a state of empathy and compassion and love, than we do in a state of separation. - Rollin McCraty (HearthMath)
The heart when it beats, it generates a large measurable electromagnetic field and radiates external to the body. We are like a television station and a television set all the same time. We are sending and receiving information every moment. And hearth math now believes that the human heart may be able to predict the future.
There is a general lay sense that all adversity is bad. And the scientific research does not really support that. One of the key ingredients to happiness is being able to recover from adversity more quickly. So it's not that the people who are happy don't respond to adversity. They do. They show an appropriate response to adversity. But they come back down to baseline quickly. (Richard J. Davidson)
There is no such thing as pleasure without pain of whatever sort emotional or otherwise. Physical or otherwise. Your nervous system is a differential engine. It looks at differences. It looks at contrasts. That's all it cares about. It integrates information by integrating a bunch of little differences in things. (P. Read Montague)
We are told in our society that the way to be a competent person, the way to be a good person is to make a lot of money. In the last 50 years, economic growth has gone up a lot, but happiness has remains stagnant.(Tim Kasser)
Hedonic adaptation: Whatever level of wealth of material goods you have, you adapt to it and you'll always want more.
We make a distinction between two main kind of goals:
intrinsic goals (like personal growth, close relations, community feeling)
extrinsic goals (focused externally like money, image, status etc)
People who have more extrinsic goals were reprting less satisfaction with their lives. They were more dipressed, more anxious, less energy.
Intrinsic people were more happy and have less anxiety.
http://www.businessinsider.com/extrinsic-goals-are-an-obstacle-to-happiness-2014-7
Gratitude, compassion, caring, love - these are to me what I would call spiritual emotions, and they make you think of things bigger than yourself. If you only seek your own happiness, it can be kind of a selfish thing. But once you move to the spiritual emotions and worry about the well-being of the world, your life grows. You care about something bigger than yourself. You, in a way, can transcend your own life, your own death, by caring these things bigger than yourself.
From Movie 'I AM':
The medical paradigm of our last 30 years has been the body's there to carry the brain around and the brain's in control of everything. Really not that way. 90% to 95% of the nerves are carrying information from the body to the brain and not the brain to the body. So, in reality, the heart send far more information to the brain than the brain sends to the heart.
In a sense, the heart is the boss of us. And they have discovered if you take readings of the interstitial beats of the heart, the pause can tell us what the emotional state a person is in. If the heart is sending stressful or a negative emotion or pattern, that literally inhibits our brain. We can't think clearly. We function better in a state of empathy and compassion and love, than we do in a state of separation. - Rollin McCraty (HearthMath)
The heart when it beats, it generates a large measurable electromagnetic field and radiates external to the body. We are like a television station and a television set all the same time. We are sending and receiving information every moment. And hearth math now believes that the human heart may be able to predict the future.
Wednesday, November 12, 2014
Trip to Acharya VidyaSagar 3 (2014)
बङे ही भाग्य वश सन् २०१४ अक्टूबर माह में आचार्य श्री जी के संघ के दर्शन का शुभ विचार हुआ। इसलिये हम विदिशा पहुंच गये।
जाते जी देखा कि एक श्रावक जी की सल्लेखना चल रही है। वें इन्दौर के हैं और उनका नाम पटौदी जी पता पङा। जिस दिन हम पहुंचे तो एक कमरे में वें लेटे हुए थे, और बाहर board लगा था कि ’केवल ब्रहम्चारी भैया ही कमरे में प्रवेश करें’। अन्दर एक ब्रहम्चारी भैया वैयवृत्ति कर रहे थे। अगले दिन बता पङा कि रात्रि में सल्लेखना पूर्ण हो गयी। शाम को मुनि श्री संभवसागर महाराज जी के पास गये तो उन्होने बतलाया कि किस प्रकार से सल्लेखना हुई।
कुछ बहनो के चोके में हम जुङ गये। एक महाराज जी का हमारे चौके में आहार हुआ। महाराज जी का नमक, चीनी और हरी का त्याग था। उन्होने रोटी, मूंग की दाल ली और सूखे चावल लिये। मुनियों के लिये तो रस परित्याग तप बहुत साधारण है, मगर मेरे लिये तो यह अद्भुत था। पंचम काल में यह दृश्य मिलने का सौभाग्य हुआ तो ऐसी लगा कि मुझे अपने पुण्य से ज्यादा ही मिल गया। उनके दर्शन करके लगा कि कहां वें तपस्या और त्याग की मूर्ति, और कहां मैं विषय-कषाय में लिप्त तुच्छ प्राणी।
आचार्य श्री जी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। उन्हे अपने बारे में बतलाया तो उन्होने प्रसंगवश भारत के इतिहास और संस्कृति को जानने के लिये मुझसे कहा। इसके लिये उन्होने दो पुस्तक अध्ययन करने का निर्देश दिया। आचार्य श्री जी के चरण स्पर्श करने और उनसे चर्चा करने का सौभाग्य मिला तो लगा जीवन धन्य हो गया।
आचार्य श्री जी के द्वारा ४ दिक्षायें देखने का अवसर मिला। जिस दिन दिक्षायें हुई, उस दिन सुबह हम आचार्य श्री जी जब आहार चर्या के लिये निकले, तब उनके पीछे पीछे चल पङे। ऋषि भैया जी ने आचार्य श्री जी को पङगाया और फ़िर लगभग तीन किलोमीटर दूर उनके घर तक चलते रहे। वहां आचार्य श्री के आहार शुरू होने पर हम वापस आये। वापस आने पर पता पङा कि ऋषि भैया ने आहार के बाद आचार्य श्री जी से दिक्षा के लिए बहुत निवेदन किया, और आचार्य श्री ने ऋषि भैया को दीक्षा देकर धन्य कर दिया। साथ में ३ और भैया जी की दीक्षायें हुई। ४ दीक्षार्थी में से ३ दीक्षार्थी तो बीस से तीस वर्ष उम्र के ही लग रहे थे। वस्त्र उतारते वक्त परिग्रह त्याग का जो आनन्द दीक्षार्थीयों के मुखमण्डल में दिखाई दिया, वैसा आनन्द शायद इस दुनिया में कहीं ओर ना दिखाई दे सके। ४ दीक्षार्थियों का मुनि बनकर जीवन धन्य हो गया, और हमारा उनकी दिक्षायें देखकर। अब दिक्षायें देख ली, तो ये भावना हुई कि कब मेरे ऊपर आचार्य परमेष्ठी की करूणा हो और मेरा उपादान बलवान हो, और मेरे को भी रत्नत्रय की प्राप्ति हो। दिक्षायें देखना दुर्लभ है। ना जाने कौन सा ऐसा पुण्य किया था कि मेरे को ये अवसर मिला।
विदिशा से खुरई गये और वहां आचार्य श्री जी के संघ के तीन महाराज जी: वीरसागर महाराज जी, विशाल सागर महाराज जी और धवल सागर महाराज जी: के दर्शन हुए। वहां पता पङा कि वीर सागर महाराज जी के १०२ बुखार था और उन्होने उसी में केश लौंच किया और उस दिन उपवास भी रखा। ऐसी त्याग तपस्या का जहां वातावरण हो, वह प्राप्त होने का सौभाग्य मिलना दुर्लभ है। रत्नत्रय को धारण करना तो अत्यन्त दुर्लभ है ही, मगर चलते फ़िरते रत्नत्रय धारियों के दर्शन करना भी महा दुर्लभ।
खुरई में एक घर ने हमें भोजन पर आमंत्रित किया। उनके चौके पर हम पहले पङगाहन के लिए खङे हुए, मगर आहार दान का सौभाग्य ना होने पर भोजन किया। परिवार की महिला की दो बहने आर्यिका हैं, और दो पुत्री हैं जिनमें से छोटी पुत्री के आर्यिका बनने की भावना है। ये भी आहार तैयार करके, सबको भोजन कराके फ़िर मन्दिर जाकर पूजन करके दिन के २ बजे ही भोजन करती हैं। इस प्रकार के परिवारों से ही बुन्देलखण्ड की धरती पवित्र है।
खुरई से सागर गये और मुनि श्री क्षमासागर महाराज जी के दर्शन किये। उनका बिगङता स्वास्थ्य देखकर मन दहल गया। लगा कि कर्म भी कितने निर्दयी है कि एक महाव्रती को भी इन्होने नहीं छोङा। वें बोल नहीं पा रहे थे और ना ही slate इत्यादि का प्रयोग कर रहे थे। देखने में कमजोर लग रहे थे।
बुन्देलखण्ड और इस तरफ़ के लोगो में कई विशेष बात देखने को मिली। यहां के लोग कष्टसहिष्णु हैं। प्रसन्नतापूर्वक त्याग, तपस्या करते हैं, और व्रतियों के लिए समर्पित हैं। अन्य क्षेत्रो पर लोग आजकल सुख साधनो की ओर ज्यादा आकर्षित होकर त्याग, तपस्या से दूर होते जा रहे हैं, और अपनी इस प्रवृत्ति के कारण मुनियों की सेवा से भी वंचित हो जाते हैं। जो सुख सुविधा का आदि होगा, वह व्रतियों के लिये या धर्म पाने के लिए कष्ट नहीं सह पायेगा। और बिना कष्ट के उपलब्धियां सीमित ही रहती हैं।
हस्तिनापुर अतिशय क्षेत्र के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहां आचार्य भारत भूषण महाराज जी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होने अपने ग्रहस्थ जीवन के ७ प्रतिमा वाली अवस्था का वर्णन किया कि किस प्रकार वो घर में रहकर और दिल्ली के सदर बाजार में नौकरी करते हुए भी ७ प्रतिमा का पालन करते थे। उनके बात को सुनकर बहुत प्रेरणा मिली। बाद में महाराज जी से समयसार जी के कुछ विषयों पर चर्चा हुई, और महाराज जी से बहुत कुछ सीखने को मिला।
जाते जी देखा कि एक श्रावक जी की सल्लेखना चल रही है। वें इन्दौर के हैं और उनका नाम पटौदी जी पता पङा। जिस दिन हम पहुंचे तो एक कमरे में वें लेटे हुए थे, और बाहर board लगा था कि ’केवल ब्रहम्चारी भैया ही कमरे में प्रवेश करें’। अन्दर एक ब्रहम्चारी भैया वैयवृत्ति कर रहे थे। अगले दिन बता पङा कि रात्रि में सल्लेखना पूर्ण हो गयी। शाम को मुनि श्री संभवसागर महाराज जी के पास गये तो उन्होने बतलाया कि किस प्रकार से सल्लेखना हुई।
- उन्होने सल्लेखना के अतिचारो के बारे में समझाया, और बतलाया कि जैसे अतिचार शास्त्रो में बतलाये गये हैं वैसे परिणामो के आने की सम्भावना रहती है और सच्ची सम्बोधन से श्रावक उसको सल्लेखना में जीत भी लेता है। जैसे - एक अतिचार है कि श्रावक को मरण की इच्छा होये कि सल्लेखना जल्दी से समाप्त हो जाये।
- उन्होने बताया कि श्रावक को निर्जल उपवास के साथ एक समय पानी लेने वाले उपवास का भी अभ्यास होना चाहिये, वह अभ्यास सल्लेखना में काफ़ी उपयोगी रहता है।
- गुरू के प्रति समर्पण और गुरू की आज्ञा का पूरा पालन बहुत जरूरी है।
- सल्लेखना के लिये प्रतिमा होनी जरूरी है।
- पटौदी जी आचार्य श्री जी से रोज आशिर्वाद लेने के बाद ही जल ग्रहण करते थे। मगर जल वाले उपवास का अभ्यास ना होने से वो ज्यादा जल नहीं ले पा रहे थी। महाराज जी ने कहा कि जल अच्छी मात्रा में जाये तो वो शरीर के लिये अच्छा रहता है।
कुछ बहनो के चोके में हम जुङ गये। एक महाराज जी का हमारे चौके में आहार हुआ। महाराज जी का नमक, चीनी और हरी का त्याग था। उन्होने रोटी, मूंग की दाल ली और सूखे चावल लिये। मुनियों के लिये तो रस परित्याग तप बहुत साधारण है, मगर मेरे लिये तो यह अद्भुत था। पंचम काल में यह दृश्य मिलने का सौभाग्य हुआ तो ऐसी लगा कि मुझे अपने पुण्य से ज्यादा ही मिल गया। उनके दर्शन करके लगा कि कहां वें तपस्या और त्याग की मूर्ति, और कहां मैं विषय-कषाय में लिप्त तुच्छ प्राणी।
आचार्य श्री जी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। उन्हे अपने बारे में बतलाया तो उन्होने प्रसंगवश भारत के इतिहास और संस्कृति को जानने के लिये मुझसे कहा। इसके लिये उन्होने दो पुस्तक अध्ययन करने का निर्देश दिया। आचार्य श्री जी के चरण स्पर्श करने और उनसे चर्चा करने का सौभाग्य मिला तो लगा जीवन धन्य हो गया।
आचार्य श्री जी के द्वारा ४ दिक्षायें देखने का अवसर मिला। जिस दिन दिक्षायें हुई, उस दिन सुबह हम आचार्य श्री जी जब आहार चर्या के लिये निकले, तब उनके पीछे पीछे चल पङे। ऋषि भैया जी ने आचार्य श्री जी को पङगाया और फ़िर लगभग तीन किलोमीटर दूर उनके घर तक चलते रहे। वहां आचार्य श्री के आहार शुरू होने पर हम वापस आये। वापस आने पर पता पङा कि ऋषि भैया ने आहार के बाद आचार्य श्री जी से दिक्षा के लिए बहुत निवेदन किया, और आचार्य श्री ने ऋषि भैया को दीक्षा देकर धन्य कर दिया। साथ में ३ और भैया जी की दीक्षायें हुई। ४ दीक्षार्थी में से ३ दीक्षार्थी तो बीस से तीस वर्ष उम्र के ही लग रहे थे। वस्त्र उतारते वक्त परिग्रह त्याग का जो आनन्द दीक्षार्थीयों के मुखमण्डल में दिखाई दिया, वैसा आनन्द शायद इस दुनिया में कहीं ओर ना दिखाई दे सके। ४ दीक्षार्थियों का मुनि बनकर जीवन धन्य हो गया, और हमारा उनकी दिक्षायें देखकर। अब दिक्षायें देख ली, तो ये भावना हुई कि कब मेरे ऊपर आचार्य परमेष्ठी की करूणा हो और मेरा उपादान बलवान हो, और मेरे को भी रत्नत्रय की प्राप्ति हो। दिक्षायें देखना दुर्लभ है। ना जाने कौन सा ऐसा पुण्य किया था कि मेरे को ये अवसर मिला।
विदिशा से खुरई गये और वहां आचार्य श्री जी के संघ के तीन महाराज जी: वीरसागर महाराज जी, विशाल सागर महाराज जी और धवल सागर महाराज जी: के दर्शन हुए। वहां पता पङा कि वीर सागर महाराज जी के १०२ बुखार था और उन्होने उसी में केश लौंच किया और उस दिन उपवास भी रखा। ऐसी त्याग तपस्या का जहां वातावरण हो, वह प्राप्त होने का सौभाग्य मिलना दुर्लभ है। रत्नत्रय को धारण करना तो अत्यन्त दुर्लभ है ही, मगर चलते फ़िरते रत्नत्रय धारियों के दर्शन करना भी महा दुर्लभ।
खुरई में एक घर ने हमें भोजन पर आमंत्रित किया। उनके चौके पर हम पहले पङगाहन के लिए खङे हुए, मगर आहार दान का सौभाग्य ना होने पर भोजन किया। परिवार की महिला की दो बहने आर्यिका हैं, और दो पुत्री हैं जिनमें से छोटी पुत्री के आर्यिका बनने की भावना है। ये भी आहार तैयार करके, सबको भोजन कराके फ़िर मन्दिर जाकर पूजन करके दिन के २ बजे ही भोजन करती हैं। इस प्रकार के परिवारों से ही बुन्देलखण्ड की धरती पवित्र है।
खुरई से सागर गये और मुनि श्री क्षमासागर महाराज जी के दर्शन किये। उनका बिगङता स्वास्थ्य देखकर मन दहल गया। लगा कि कर्म भी कितने निर्दयी है कि एक महाव्रती को भी इन्होने नहीं छोङा। वें बोल नहीं पा रहे थे और ना ही slate इत्यादि का प्रयोग कर रहे थे। देखने में कमजोर लग रहे थे।
बुन्देलखण्ड और इस तरफ़ के लोगो में कई विशेष बात देखने को मिली। यहां के लोग कष्टसहिष्णु हैं। प्रसन्नतापूर्वक त्याग, तपस्या करते हैं, और व्रतियों के लिए समर्पित हैं। अन्य क्षेत्रो पर लोग आजकल सुख साधनो की ओर ज्यादा आकर्षित होकर त्याग, तपस्या से दूर होते जा रहे हैं, और अपनी इस प्रवृत्ति के कारण मुनियों की सेवा से भी वंचित हो जाते हैं। जो सुख सुविधा का आदि होगा, वह व्रतियों के लिये या धर्म पाने के लिए कष्ट नहीं सह पायेगा। और बिना कष्ट के उपलब्धियां सीमित ही रहती हैं।
हस्तिनापुर अतिशय क्षेत्र के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहां आचार्य भारत भूषण महाराज जी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होने अपने ग्रहस्थ जीवन के ७ प्रतिमा वाली अवस्था का वर्णन किया कि किस प्रकार वो घर में रहकर और दिल्ली के सदर बाजार में नौकरी करते हुए भी ७ प्रतिमा का पालन करते थे। उनके बात को सुनकर बहुत प्रेरणा मिली। बाद में महाराज जी से समयसार जी के कुछ विषयों पर चर्चा हुई, और महाराज जी से बहुत कुछ सीखने को मिला।
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